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संतोषी माता व्रत कथा - Santoshi Mata Vrat Katha | संतोषी माता की आरती

Santoshi Mata Vrat Katha : मन को शांति और जीवन की परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए मां संतोषी का व्रत किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार संतोषी माता की पूजा और व्रत लगातार 16 शुक्रवार तक करना चाहिए। अपने रिद्धि-सिद्धि, धन-धान्य, सोना, चांदी, मूंगा और अन्य रत्नों से संपन्न परिवार के कारण, इन्हें प्रसन्नता, सुख-शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी माना जाता है।

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संतोषी माता व्रत कथा - Santoshi Mata Vrat Katha

एक वृद्धा थी, जिसका एकमात्र पुत्र था। पुत्र के विवाह के बाद वह अपनी बहू से घर के सभी काम करवाती, लेकिन उसे ठीक से भोजन नहीं देती थी। यह सब लड़का देखता, पर मां से कुछ कह नहीं पाता। बहू दिनभर घर के कामों में व्यस्त रहती—चूल्हा संभालती, रोटी बनाती, बर्तन साफ करती, कपड़े धोती और इसी में उसका सारा समय बीत जाता। काफी सोच-विचार के बाद एक दिन लड़के ने मां से कहा—“मां, मैं परदेस जा रहा हूँ।” बेटे की बात सुनकर मां को खुशी हुई और उसने उसे जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद लड़का अपनी पत्नी के पास गया और बोला—“मैं परदेस जा रहा हूँ, मुझे कोई निशानी दे दो।” बहू बोली—“मेरे पास देने योग्य कुछ भी नहीं है।” यह कहकर वह पति के चरणों में गिरकर रोने लगी। उसके गोबर से सने हाथों के छाप पति के जूतों पर पड़ गए।

पुत्र के जाने के बाद सास के अत्याचार बढ़ गए। एक दिन बहू दुखी होकर मंदिर चली गई। वहाँ उसने देखा कि कई स्त्रियाँ पूजा-अर्चना कर रही थीं। उसने उनसे व्रत के बारे में जानकारी ली तो उन्होंने बताया कि वे संतोषी माता का व्रत कर रही हैं, जिससे सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं। स्त्रियों ने कहा—“शुक्रवार को नहा-धोकर एक लोटे में शुद्ध जल लेकर गुड़ और चने का प्रसाद लें और सच्चे मन से माता का पूजन करें। खटाई भूलकर भी न खाएं और न किसी को दें। भोजन एक समय में करें।” व्रत का विधान सुनकर बहू ने प्रतिशुक्रवार संयम से व्रत करना शुरू कर दिया। माता की कृपा से कुछ ही दिनों में पति का पत्र आया और थोड़े समय बाद पैसा भी प्राप्त हुआ। प्रसन्न होकर उसने फिर व्रत किया और मंदिर में अन्य स्त्रियों से कहा—“संतोषी माता की कृपा से हमें पति का पत्र और धन प्राप्त हुआ।” अन्य स्त्रियाँ भी श्रद्धा भाव से व्रत करने लगीं। बहू ने कहा—“हे माता! जब मेरा पति घर लौट आएगा, तब मैं आपके व्रत का उद्यापन करूंगी।”

एक रात संतोषी माता ने उसके पति को स्वप्न में दिखाया और पूछा—“तुम अपने घर क्यों नहीं जा रहे?” पति ने कहा—“सेठ का सारा सामान अभी नहीं बिका और पैसा भी नहीं आया।” उसने सेठ को स्वप्न की बात बताई और घर जाने की अनुमति मांगी, लेकिन सेठ ने मना कर दिया। माता की कृपा से कई व्यापारी आए और सोना-चांदी सहित अन्य सामान खरीदकर ले गए। कर्जदारों ने भी अपना पैसा लौटा दिया। अब साहूकार ने उसे घर जाने की अनुमति दे दी। घर लौटकर पुत्र ने अपनी मां और पत्नी को बहुत सारे रुपये दिए। पत्नी ने कहा—“मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है।” उसने सभी को निमंत्रण दिया और उद्यापन की तैयारी पूरी की। पड़ोस की एक स्त्री, जो उसे सुखी देख ईर्ष्या कर रही थी, अपने बच्चों को यह सिखा गई कि वे भोजन के समय खटाई जरूर मांगें।

उद्यापन के समय, खाना खाते-खाते बच्चे खटाई के लिए मचल उठे। बहू ने उन्हें पैसा देकर शांत किया। बच्चे उस पैसे से दुकान से इमली-खटाई खरीदकर खाने लगे। इस पर माता संतोषी को क्रोध आया। राजा के दूत उसके पति को पकड़कर ले जाने लगे। तभी किसी ने बताया कि उद्यापन में बच्चों ने पैसों से इमली-खटाई खाई है। बहू ने फिर से व्रत के उद्यापन का संकल्प लिया। संकल्प पूरा करने के बाद जब वह मंदिर से निकली, तो राह में उसका पति दिखाई दिया। पति ने कहा—“इतना धन जो कमाया है, उसका टैक्स राजा ने मांगा था।” अगले शुक्रवार को उसने विधिपूर्वक पुनः व्रत का उद्यापन किया। इससे संतोषी माता प्रसन्न हुईं। नौ महीने बाद उन्हें चाँद-सा सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। अब सास, बहू और पुत्र माता की कृपा से सुख-शांति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगे।

संतोषी माता की आरती

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन को, सुख-संपत्ति दाता॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

सुंदर, चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हो।
हीरा-पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे।
मंद हँसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चँवर ढुरे प्यारे।
धूप, दीप, मधु-मेवा, भोग धरें न्यारे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामें संतोष कियो।
संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

जय शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।
भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक, चरणन सिर नाई॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

भक्ति-भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै।
जो मन बसे हमारे, इच्छा-फल दीजै॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए।
बहु धन-धान्य भरे घर, सुख-सौभाग्य दिए॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।
पूजा-कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

संतोषी माँ की आरती, जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि सुख-संपत्ति, जी भरकर पावे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता...

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