Shri Ganesh Chalisa : गणेश चालीसा का नियमित पाठ विघ्नों को दूर करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। भगवान गणेश को बुद्धि, शुभारंभ और सफलता के प्रतीक देवता माना जाता है। चालीसा की चौपाइयों में उनके गुणों, कृपा और संरक्षण का सुंदर वर्णन मिलता है, जिसे श्रद्धा से पढ़ने पर मन एकाग्र होता है और आत्मविश्वास मजबूत होता है। यह पाठ घर और कार्यस्थल में शांति का वातावरण बनाने में सहायक होता है तथा नकारात्मक विचारों को कम करता है। किसी भी नए कार्य से पहले गणेश चालीसा का पाठ करने से सफलता की संभावना बढ़ती है और मन में धैर्य व संतुलन बना रहता है।
श्री गणेश चालीसा - Shri Ganesh Chalisa
॥ दोहा ॥
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरन करन शुभ काजू॥
जय गजवदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्र तुंड शुचि शुंड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजित मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूला।
मोदक भोग सुगंधित फूला॥
सुंदर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व विख्याता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर डुलावें।
मूषक वाहन सोहत द्वारें॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न भए तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्ध्यान रूप हवै।
पालना पर बालक स्वरूप भए॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल मगन सुख मंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन बरसावहिं॥
शंभु उमा बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आए शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
कहत लगे शनि मन सकुचाई।
का करिहौं शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पड़तहिं शनि दृष्टि कोन प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो आकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल भए भारी।
सो दुख दशा गयो नहिं बारी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए।
काटि चक्र सो गज सिर लाए॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शंभु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु पितु के धर लीन्हे।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हे॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहस मुख सके न गाई॥
मैं मति हीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
॥ दोहा ॥
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करे कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहै जगत सम्मान॥
