सूर वीर सम्मुख सदा, एक राम का दास।
जीवन-मरण स्थिति मिटाकर, किया ब्रह्म में वास।।
श्रीहनुमान जी का स्वरूप और भक्ति
जन-जन के प्रिय श्रीहनुमान जी शूरवीर हैं, श्रीराम जी के अनन्य सेवक हैं। वे उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं और जीवन-मरण से अतीत होकर सदा परब्रह्म श्रीराम में वास करते हैं।
व्रज में हनुमान भक्ति का व्यापक स्वरूप
चौरासी कोस व्रज और उसके आसपास का विस्तृत क्षेत्र श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा एवं विश्वासपूर्ण भक्ति से ओत-प्रोत है। यहां के आबाल-वृद्ध नर-नारी सभी बजरंगबली को इष्ट देवता के रूप में पूजते हैं। व्रज-भूमि के शिक्षित समाज में तो हनुमान जी की घर-घर पूजा होती ही है, साथ ही यहां की ग्रामीण जनता में भी इस चमत्कारपूर्ण देवता के प्रति अटूट श्रद्धा देखने योग्य है।
व्रज का शायद ही कोई ऐसा ग्राम हो, जहां श्रीहनुमान जी के दो-चार छोटे-बड़े मंदिर न हों। व्रजवासी प्रातः और सायं इन दिव्य मंदिरों में पहुंचकर साधना-आराधना करते हैं तथा मनोकामना-पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।
बाल्यकाल से जागृत श्रद्धा और परंपराएं
व्रज में बालकों के मन में बाल्यकाल से ही श्रीहनुमान जी के प्रति एक विशिष्ट श्रद्धा-भावना जाग्रत की जाती है। माताएं अपने शिशुओं की आधि-व्याधि दूर करने के लिए किसी भूत-प्रेत या पीर-पैगंबर की अपेक्षा श्रीहनुमान जी का ही आश्रय लेती हैं। वे श्रीहनुमान मंदिर के पुजारी से मोरपंख का झाड़ा लगवाती हैं और आश्चर्यजनक रूप से नन्हा शिशु भयंकर पीड़ा से मुक्त होकर पुनः खेलने-कूदने लगता है।
व्रज के छोटे बालक जब प्रथम बार पाठशाला में प्रवेश करते हैं, तब पट्टी-पूजन के अवसर पर श्रीहनुमान जी के नाम की सिन्नी (मिठाई) बांटी जाती है। व्रजवासियों में एक और सुंदर परंपरा पाई जाती है - जब बच्चे का अन्नप्राशन संस्कार कराया जाता है, तब उस अन्न को पहले श्रीहनुमान जी के भोग की भावना से बंदरों और लंगूरों को खिलाया जाता है, तत्पश्चात शिशु को भोजन कराया जाता है।
नववधू के गृह-प्रवेश के समय, जहां अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है, वहीं प्रथम मंगलवार या शनिवार को व्रत रखकर वर-वधू श्रीहनुमान जी का पूजन करते हैं।
अखाड़ा परंपरा और युवाओं में श्रद्धा
व्रज के युवक वर्ग को कुश्ती और कसरत का विशेष शौक होता है, इसलिए लगभग प्रत्येक श्रीहनुमान मंदिर के साथ एक अखाड़ा अवश्य बना होता है। यदि बड़ा अखाड़ा न भी हो, तो भी एक छोटे से आले में श्रीहनुमान जी की प्रतिमा अवश्य स्थापित रहती है और उनके पास एक छोटी गदा रखी होती है।
कोई भी पहलवान अखाड़े में उतरने से पहले श्रीहनुमान जी पर चोला चढ़ाकर, धूप-दीप-नैवेद्य अर्पित कर मनौती मानता है और बजरंगबली की “जय-जयकार” करते हुए अभ्यास प्रारंभ करता है। आश्चर्य की बात यह है कि अखाड़े में पराजित होने वाला पहलवान भी पुनः श्रीहनुमान जी की साधना में लग जाता है।
व्रज-संस्कृति में हनुमान उपासना का इतिहास
इस प्रकार व्रज-संस्कृति में श्रीहनुमान जी के प्रति श्रद्धा-भक्ति जन-जन में व्याप्त दिखाई देती है। श्रीहनुमद्-उपासना की इस परंपरा के पीछे सृष्टि के प्रारंभ से जुड़ा एक उज्ज्वल इतिहास भी वर्णित है। कथा प्रसिद्ध है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने समुद्र पर सेतु का निर्माण कराया, तब श्रीहनुमान जी हिमालय की गोद से एक विशाल पर्वत उठाकर ला रहे थे। उसी समय भगवान की आज्ञा हुई कि सभी वानर अपने-अपने स्थान पर पर्वत स्थापित कर दें। तब श्रीहनुमान जी ने उस गिरिराज (गोवर्धन) को व्रजभूमि में स्थापित कर दिया।
गिरिराज और श्रीहनुमान संवाद
गिरिराज अत्यंत दुखी होकर बोले - “पवनपुत्र!
आपने तो मुझे कहीं का भी नहीं रहने दिया। एक ओर भगवान शिव की निकटता छूट गई और दूसरी ओर भगवान श्रीराम की सेवा और दर्शन से भी वंचित रह गया।”
तब श्रीहनुमान जी ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा - “हे गिरिराज! आप चिंता न करें। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपको भगवान के दर्शन अवश्य कराऊँगा। यदि श्रीराम रूप में नहीं, तो श्रीकृष्ण रूप में भगवान स्वयं आपको अपने हाथों पर धारण करेंगे।”
श्रीकृष्ण दर्शन का वचन
इस पर गिरिराज ने कहा - “अंजनीनंदन!
आपका आशीर्वाद स्वीकार है, किंतु एक प्रार्थना और है—जब श्रीकृष्ण आएं, तब आप भी उनके साथ उपस्थित रहें।”
तब श्रीहनुमान जी वचनबद्ध होकर बोले - “हे पर्वतराज! जहां-जहां श्रीराम और श्रीकृष्ण होंगे, वहां-वहां मैं अवश्य उपस्थित रहूँगा और आपकी कंदराओं में उनकी लीलाओं का दर्शन करूंगा।”
श्रीराम का उपकार स्मरण
ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीहनुमान जी के इस उपकार से उऋण होने के लिए ही भगवान श्रीराम ने श्रीकृष्णावतार में उन्हें सखा के रूप में स्वीकार किया। श्रीराम ने स्वयं कहा था -
“सुनु कपि, तोहि समान उपकारी।
नहिं काउ सुर, नर, मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा,
सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत, तोहि उऋण मैं नाहीं,
देखेउँ करि विचार मन माहीं॥”
व्रज में हनुमान जी की उपस्थिति
व्रजवासियों के कथानुसार, गिरिराज की परिक्रमा में अनेक स्थानों पर श्रीहनुमान जी विराजमान हैं, जिससे वे प्रत्येक दिशा से श्रीकृष्ण की सेवा कर सकें। आज भी गिरिराज के चारों ओर अनेक चमत्कारपूर्ण हनुमान विग्रह स्थापित हैं और वानरों की उपस्थिति इस कथा की पुष्टि करती प्रतीत होती है।
दीपावली और लांगुरिया पूजा
व्रज में दीपावली के अवसर पर गोवर्धन पूजा के साथ “लांगुरिया” की पूजा भी की जाती है, जो श्रीहनुमान जी का ही प्रतीक मानी जाती है। “लांगुरिया” शब्द “लांगूल” (पूंछ) से बना है, जो व्रजभाषा में प्रचलित हो गया है। पूजन के पश्चात समस्त सामग्री बंदरों और लंगूरों को अर्पित कर दी जाती है।
व्रज के प्रमुख हनुमान स्थल
व्रज में अनेक प्रसिद्ध स्थान हैं, जैसे - गोकुल के समीप “हठीले हनुमान” तथा वृंदावन के पास “लुटेरिया हनुमान”, जिनका संबंध श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं से जोड़ा जाता है। गोवर्धन में “पूंछरी का लौठा” भी श्रीहनुमान जी का ही स्वरूप माना जाता है।
महाभारत काल में भी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर स्थित होकर श्रीहनुमान जी ने उसकी रक्षा की थी।
निष्कर्ष
इस प्रकार व्रज-संस्कृति में श्रीकृष्ण लीला के साथ श्रीहनुमान जी का गहरा और अविच्छिन्न संबंध स्थापित होता है।
बोलो - हनुमान जी महाराज की जय!
श्री व्रज धाम की जय!
