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गाजीपुर जनपद में कंपोजिट विद्यालय ताराडीह की शैक्षिक गुणवत्ता देख 10 गुना बढ़ गए बच्चे

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कभी खंडहर सा रहा कंपोजिट विद्यालय ताराडीह आज चमचमाता और हरा-भरा दिखता है। बच्चों से पूरा परिसर गुलजार रहता है, जैसे कोई कांवेन्ट स्कूल। पहले लोग यहां अपने बच्चों को भेजने से कतराते थे, लेकिन अब एडमिशन करने के लिए शिक्षकों की मिन्नतें कर रहे हैं। क्षमता से अधिक बच्चे होने के बाद स्कूल अब एडमिशन करना बंद कर दिया है। इतना सब हो पाया प्रभारी प्रधानाध्यापक विजय प्रताप सिंह के जीवट, लगन, मेहनत, टीम भावना व समर्पण भाव से। पिता की एक नसीहत ने विजय प्रताप सिंह को कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा कर दिया और आज विद्यालय की तस्वीर देखकर हर किसी के मुंह से ‘वाह’ निकलता है।

विजय प्रताप सिंह 2016 में देवरिया जनपद से स्थानांतरित होकर आए। जब इस विद्यालय पर पदभार ग्रहण करने पहुंचे तो वहां की स्थिति देखकर मन बिदक गया। यहां प्राथमिक व उच्च प्राथमिक दोनों विद्यालय एक ही परिसर में थे। स्कूल में चहारदीवारी व गेट तक नहीं था। पूरे परिसर में घास-फूस उगे हुए थे। रजिस्टर में 100 बच्चे पंजीकृत थे, लेकिन उपस्थित 12-14 से कभी अधिक नहीं हो पाती थी। 

आसपास गांव के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते थे। खंडहर जैसा विद्यालय में विजय प्रताप का मन नहीं लग रहा था। उन्होंने अपने पिता से मन की बात बताई और कहीं और तैनाती कराने की बात कही। पिता ने कहा कि सरकार ने जहां भेजा है, वहीं मन लगाकर काम करो। अगर ईमानदारी से काम किए तो सबकुछ बदल जाएगा। पिता की बात विजय के दिल में बैठ गई और उन्होंने स्कूल को बदलने का प्रण किया।

सहयोगियों की तैयार की टीम

विजय प्रताप ने विद्यालय में तैनात और शिक्षकों के साथ बैठक कर अपनी योजना बतायी और स्कूल का शैक्षिक वातावरण बदलने का संकल्प दिलाया। इसके बाद टीम भावना ने सभी शिक्षकों ने काम शुरू किया। अपने खर्च से पूरे परिसर की साफ-सफाई कराई और बेहतर पेटिंग कराई। इससे पूरा स्कूल चमचमा उठा। विभाग से अनुरोध कर चहारदीवारी व गेट बनवाया। पेयजल व शौचालय की व्यवस्था कराई। 

गांव-गांव जाकर अभिभावकों से संपर्क कर बच्चों का प्रवेश लेना शुरू किया। नियमित कक्षाओं का संचालन शुरू हुआ। सुबह समय से स्कूल खुलता और शाम को बंद होने के बाद भी एक्ट्रा समय देकर कमजोर बच्चों को पढ़ाया जाने लगा। इसके बाद तो फिर यहां प्रवेश के लिए मारामारी मच गई और बच्चों की संख्या 300 पहुंच गई। आसपास के निजी स्कूलों से नाम कटवाकर बच्चे यहां आने लगे।

12 महीने शिक्षकों ने अपने खर्च से खिलाया माध्याह्न भोजन

विजय प्रताप सिंह ने बताया कि मध्याह्न भोजन को लेकर ग्राम प्रधान और शिक्षकों में मतभेद था। माध्याह्न भोजन के लिए प्रधान का सहयोग न मिलने पर हमने सभी शिक्षकों के सहयोग से 12 महीने तक बच्चों को अपने खर्च पर मध्याह्न भोजन खिलाया। प्रतिदिन 250-300 बच्चों का माध्याह्न भोजन बनाना आसान नहीं था, लेकिन हमारे कदम पीछे नहीं हटे। डेढ़ वर्ष बाद उसका भुगतान हो पाया।

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