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पूर्वांचल के किसानों को पराली न जलाने के लिए किया जाएगा जागरूक, पूर्ण रूप से प्रतिबंध

प्रदूषण के कारण वातावरण में बहुत बड़ा बदलाव आया है। यह बात सभी जानते हैं। पर्यावरण में बदलाव के कारण आमजन में सीने में दर्द, गले और सांस की समस्या, आंखों में जलन और जी मिचलाना अब आम हो गया है। हालात यह है कि अस्पतालों में हर दिन कोई न कोई ऐसे मरीज आते रहते हैं। बहरहाल, ऐसी गंभीर समस्याओं से अब पूर्वांचल के जिलों का अधिकांश हिस्सा प्रभावित होना शुरू हो गया है। 

इसका मूल कारण पराली है। धान कटाई का सीजन शुरू हो गया है, इसलिए इस बार जिला प्रशासन ने किसानों को जागरूक करने के लिए जागरूकता अभियान चला रहा है। इसके अलावा मना करने के बाद भी पराली जलाने वाले लोगों को चिन्हित करने का कार्य भी किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक टन पराली जलने से 25 किग्रा पोटेशियम, 2.3 किग्रा फास्फोरस, 5.5 किग्रा नाइट्रोजन और 1 किग्रा से अधिक सल्फर मिट्टी में मिलता है। इससे मिट्टी के पोषक तत्वों और जैविक कार्बनिक पदार्थों को भारी क्षति हो रही है। 

इसके साथ कार्बन डाइआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, आक्साइड सल्फर और पार्टिकुलेट मैटर समेत ब्लैक कार्बन वातावरण में मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। इससे भी बड़ी बात तो यह है कि धान का पुआल जलाने से गर्मी मिट्टी में एक सेंटीमीटर तक प्रवेश करती है, जिससे तापमान में बढ़ोत्तरी दर्ज की जाती है। यह उपजाऊ मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया और कवक को मार देता है। यह सारे जहरीले तत्व यहां हर साल वातावरण में घोले जा रहे हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पराली जलाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा रखा है। अपर जिलाधिकारी राकेश सिंह ने बताया कि जनपद में किसान पराली न जलाएं इसके लिए संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी तय की गई है। इसके अलावा किसानों को इसके लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है, ताकि वह इससे होने वाले दुष्परिणाम से भी अवगत हो जाएं।

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