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60 सीट की बस में 80 यात्रियों का पंजीयन, कमियों को छिपाने के लिए 36 बस मालिकों को नोटिस

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ओवरलोड ट्रकें ही सड़क पर धमा-चौकड़ी नहीं मचा रही है। परिवहन विभाग की मिलीभगत से शहर की सड़कों पर ओवरलोड बसें भी दौड़ रही हैं। परिवहन विभाग ने 60 सीट की बसों का पंजीयन 80 से 85 सीट में कर दिया है। यही कारण था कि बाराबंकी जिले में बस हादसे में 18 लोगों की मौत होने के साथ कई लोग घायल हो गए थे। उस बस में 79 सीटें थीं और 100 से अधिक लोग सवार थे। ओवरलोड बसें आए दिन दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं, फिर भी परिवहन अधिकारी चेत नहीं रहे हैं। मामला उजागर होने और अपनी कमियों को छिपाने के लिए परिवहन विभाग ने अभी तक 36 बस मालिकों को नोटिस जारी कर अपनी बसों का परीक्षण कराने को कहा है।

छोटी, मध्यम, बड़ी और स्लीपर बसों में सीट की संख्या निर्धारित होती है। कंपनी उसी हिसाब से बसों को बनाती है। कई कंपनियां तो सिर्फ चेचिस बनाती है और बस की बाडी मालिक बाहर बनवाता है। बसों में सीट की संख्या बढ़ाने के लिए मालिकों ने चेचिस तीन से पांच फीट लंबा करा दिया। इसके साथ बसों सीट की संख्या 20 से 25 बढ़ गई। क्षमता से ज्यादा सीट होने पर बसें अनियंत्रित होकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। 

पंजीयन के समय नहीं आती हैं बसें :

बस का पंजीयन होने से पहले अधिकारी अधिकरी निरीक्षण कर फाइल में अपनी आख्या देते हैं। फाइल में लिखते हैं कि बस की लंबाई और चौड़ाई में कोई बदलाव नहीं किया गया है। पंजीयन की संस्तुति की जाती है। सच्चाई यह है कि पंजीयन के दौरान कोई बस परिवहन कार्यालय नहीं आती है। फाइल देखकर पंजीयन लिपिक अप्रुवल कर देता है। उसी के साथ पंजीयन अधिकारी भी अपनी मुहर लगा देते हैं।

फिटनेस में नहीं करते हैं फेल : बस का पंजीयन होने के साथ दो साल के लिए फिटनेस होता है। दो-दो साल का फिटनेस आठ साल तक होता है। इसके बाद हर साल बस मालिक फिटनेस कराने आते हैं लेकिन अधिकारी उन बसों को जांच में फेल करने की बजाय पास कर देते हैं। पंजीयन के दौरान बस नहीं आती है लेकिन फिटनेस के दौरान बस हरहाल में कार्यालय आती है। बार-बार नजर अंदाज करने के साफ जाहिर होता है कि विभागीय संलिप्तता है। 

यह है मानक : परिवहन विभाग के मुताबिक दो सीट को मिलाकर एक स्लीपर होता है। बस मालिक तय सीट रखे या दो सीट को मिलाकर स्लीपर बना दें लेकिन उसके लिए मालिक को फाइल में इसका जिक्र करना होता है। परिवहन विभाग प्रति सीट 197 रुपये टैक्स लेता है। यदि बस का परमिट आल इंडिया है तो 7811 रुपये प्रति माह टैक्स बनता है।

इन कर्मचारियों के कार्यकाल में हुआ खेल : एआरटीओ सर्वेश सिंह, अमित राजन राय, पंजीयन लिपिक अतुल सिंह, सुरेश चंद्र मालवीय और अशोक सिंह।

केस-एक : यूपी-65जेटी-0765 रविंद्र कुमार सिंह के नाम से पंजीकृत है। परिवहन कार्यालय में बस का पंजीयन 20 अगस्त-2019 को हुआ है। यह बस 60 सीटर है लेकिन वर्तमान में 15 स्लीपर और 14 सीट में पंजीकृत है। इस हिसाब से कुल सीटों की संख्या 74 हो गई। चार सितंबर को यह बस फिटनेस कराने आई तो संभागीय निरीक्षक (आरआइ) ने क्षमता से ज्यादा सीट पाने पर फेल कर दिया।

केस-दो : यूपी-65ईटी-8484 दीपक कुमार सिंह के नाम से पंजीकृत है। परिवहन कार्यालय में दो अगस्त-2016 को बस का पंजीयन 42 सीट में हुआ है लेकिन वर्तमान में 18 स्लीपर और 36 सीट में पंजीयन हुआ है। कुल सीटों की संख्या 72 हुई।

बोले अधिकारी :  तय सीट से ज्यादा बसों का पंजीयन नहीं हो सकता है। और न ही बस मालिक चेचिस में कोई बदलाव कर सकते हैं। बाराबंकी बस हादसे के बाद लग्जरी बसों का परीक्षण कराया जा रहा है। बस में कोई बदलाव होने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए एआरटीओ को निर्देश दिए गए हैं। -एके सिंह, उप परिवहन आयुक्त।

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