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वाराणसी: केले की खेती ने देवी शंकर को बनाया आत्मनिर्भर, परम्परागत खेती से हटकर किया नया प्रयोग

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किसान का बेटा किसानी करने के सिवाय आज सिर्फ नौकरी ढूंढता उम्र गुजार देता है। जब उसे अपने बीते दिनों की याद आती है तो सिर्फ पश्याताप ही करता है। जनकवि धूमिल के खेवली का लाल देवी शंकर सिंंह 60 वर्ष ने स्नातक तक पढ़ाई के बाद देश के बदलते स्वरूप में साहित्यिक, राजनीतिक क्षेत्र में कदम रखा। जनकवि सुदामा पांडेय 'धूमिल' के क्रांतिकारी तेवर को लेकर समाज मे कदम बढ़ाया। 

कहानी, कविता लेखन शौक बना लिया, लेकिन अपनी आर्थिक आजादी के लिए पूर्वजों की थाती से परम्परागत  खेती करने से हटकर कुछ नया प्रयोग शुरू किया। टीवी ,पत्र पत्रिकाओं को देखकर उन्होंने केले की खेती करने की ठान ली। 10 वर्षो से किसानी करते हुए पांच वर्ष से केले की खेती कर आत्मनिर्भर बन गए। हर दिन नया प्रयोग जारी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में दो बीघा में केले की आर्गेनिक व रासायनिक प्रयोग से खेती कर दो फसल में लाखों रुपये का आय कर रहे है। पहले मिट्टी की जांच कराई इसके बाद ढैंचा बोकर उसकी जुताई किया। खेत मे स्वायल रिपोर्ट के आधार पर सड़ी गोबर के खाद के साथ अन्य रासायनिक तत्व डाला। 

जुलाई माह में रोपाई कर देखरेख किया जिसमें दो बीघे में एक लाख रुपये खर्च हुए। प्रति बीघा 800 पौधे रोपे जो 18 से 20 रुपए प्रति पौधा लिया। जून/जुलाई से फसल निकलने लगा। खरीददार खेत पर ही पहुंचकर नगद देकर अपने वाहन से ले जाते हैं। खर्च काटकर लाख रुपये की बचत प्रति फसल मिल जाती है।

स्थानीय ग्रामीणों को दे रहे रोजगार : पढ़ाई के बाद नौकरी की चाह तो थी पर यह नही सोच था कि बेरोजगार होने के बाद किसी को रोजगार दे पाऊंगा। आज मनरेगा मजदूरों सहित स्थानीय महिला-पुरुष मजदूरों को प्रतिदिन 400 रुपए की काम भी उपलब्ध कराते हैं। केले के दो फसल के बाद तीसरा, चौथा व पांचवा भी फसल लिया जा सकता है लेकिन उत्पादन कम होने से घाटा उठानी पड़ती है। केले के साथ-साथ उसी खेत मे दोहरी लाभ लेने के लिए आलू लगाकर प्रयोग कर रहे हैं।

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