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चुनार के बलुआ पत्थर व सॉफ्ट स्टोन से बनी मूर्तियों में जान डालने वाला कारोबार खुद हुआ बेजान

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संगमरमर, चुनार के बलुआ पत्थर व सॉफ्ट स्टोन से बनी मूर्तियों और प्रतिमाओं का बड़ा कारोबार होता है। पर्यटन से सीधे जुड़े होने के कारण कोरोना संकट ने इस कारोबार पर बहुत असर डाला है। भगवान बुद्ध, देवी-देवताओं, अशोक स्तंभ, महापुरुषों की प्रतिमाएं बनारस से देश विदेश में जाती हैं। करोड़ों रुपये का निर्यात होता है, लेकिन कोरोने ने सबकुछ ठप कर दिया है।

मूर्तियों के कारोबार में 90 फीसदी तक गिरावट आई है। शिल्पियों के पास काम न के बराबर हैं। व्यापारियों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। दुकानों व कारखानों के खर्चे नहीं निकल रहे हैं। जिन कारखानों में 25 से 30 कारीगर काम करते थे, अब चौथाई भी नहीं रह गये हैं।

लल्लापुरा, कालीमहल, सोनारपुरा, लक्सा, दशाश्वमेध, चौकाघाट आदि इलाकों में मूर्ति भंडार हैं, जहां संगमरमर की मूर्तियां बनती हैं। इन कारखानों में तीन हजार से ज्यादा शिल्पी काम करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी घट गई है।

ये शिल्पी देवी-देवताओं की छोटी बड़ी मूर्तियों के अलावा महापुरुषों की प्रतिमाएं भी बनाते हैं। 100 रुपये से लेकर 80000 रुपये तक की मूर्तियां बनती हैं। दो फीट का शिवलिंग बनाने में एक शिल्पी को 10 से 15 दिन लग जाते हैं। वहीं भगवान बुद्ध की तीन फीट की प्रतिमा बनाने में 20 से 25 दिन का समय लगता है। भगवान बुद्ध के बालों और कानों की नक्काशी को उभारने के अलावा देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में जान डालने वाले ये शिल्पी इन दिनों भुखमरी की कगार पर हैं।

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