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Prayagraj News: लालगोपालगंज के चुनरी उद्योग पर टिकी प्रवासी मजदूरों व उद्यमियों की आस

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ब्रिटिश काल से चला आ रहा लालगोपालगंज का चुनरी कारोबार संसाधन की कमी एवं असुविधा की भेंट चढ़ता जा रहा है। बड़े पैमाने पर चल रहा चुनरी उद्योग कुटीर उद्योग की राह पर है। हालांकि कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन में उद्यमियों के घर वापसी से एक तरफ चुनरी व्यवसायी अपने कारोबार को पंख लगता देख रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर प्रवासी मजदूर भी चुनरी उद्योग में अपना रोजगार ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं।

अंग्रेजों के शासनकाल से चुनरी का पुश्तैनी कारोबार होता रहा है
लालगोपालगंज कस्बा की जनसंख्या तकरीबन 50 हजार है। यहां अंग्रेजों के शासनकाल से चुनरी का पुश्तैनी कारोबार होता आ रहा है। कच्चा कपड़ा पर रंग चढ़ाने की कारीगरी ने लालगोपालगंज के चुनरी व्यवसाय को एक मुकाम तक पहुंचा रखा है। यहां घर-घर में चुनरी, रामनामी, गमछा और कलावा के कारोबार ने जब तरक्की की रफ्तार पकड़ी तो कस्बा में कच्चे कपड़े की धुलाई, रंगाई और प्रोसेङ्क्षसग के साथ कंप्यूटर से डिजाइङ्क्षनग की फैक्ट्री लग गई। 

इससे संबंधित जगह-जगह छोटे बड़े कल कारखाने स्थापित हो गए। मजदूर और कारीगरों की भरमार ने चुनरी व्यवसाय को सुरैया पर पहुंचा दिया। हालांकि समय का चक्र बदलने के साथ व्यवसायिक संसाधन, कारीगर और मजदूरों की जहां किल्लत शुरू हुई वहीं दूरदराज के व्यापारियों को जरूरत के मुताबिक माल न मिलने से दिन-प्रतिदिन सब कुछ बदलता गया। इससे वर्तमान समय में कस्बा का चुनरी कारोबार कुटीर उद्योग में तब्दील हो गया है।

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