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बक्सर : दहशत, भूख और मुफलिसी के कारण वापस आए गांव

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बक्सर : खाने-पीने की समस्या नहीं थी, पेट भरने लायक पैसे भी अपने पास थे, लेकिन मकान का किराया, बच्चों की जरूरतें और इन सबसे भी बड़ी समस्या दिल्ली में लगातार कोरोना के बढ़ते मामले, ऐसे में परिवार के साथ अभी गांव आना ही एकमात्र विकल्प था, जीवन भर की कमाई से जो सामान खरीदा वह वहीं छूट गया, मकान का भाड़ा देने को पैसे नहीं थे, इसलिए मकानमालिक ने सामान निकालने नहीं दिया। यह कहना था रविवार को नॉयडा से बक्सर पहुंची श्रमिक स्पेशल ट्रेन से उतरीं आशा देवी का। उनके पति वहां गार्ड का काम करते हैं।

ट्रेन से उतरने वाला हर शख्स हैरान-परेशान था, अपने भविष्य से अनजान, बस इतनी सी बेताबी कि किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं, भले ही वहां क्वारंटाइन हो जाएं। नॉयडा में एक गारमेंट फक्ट्री में काम करने वाले अनुज ने बताया कि बाहर काम करने वाले प्रवासियों के लिए सामाजिक सुरक्षा जैसी कोई योजना नहीं है, रोज जितना काम किया उतने के पैसे मिले और काम बंद तो पैसे बंद, लॉकडाउन लंबा खिचने के कारण भोजन की समस्या होने लगी, जो पैसे थे वह किराया में चले गए, शायद ही कि किसी मकान-मालिक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के किराया के लिए परेशान नहीं करने वाली अपील को माना। 

यही समस्या वीरेन्द्र सिंह के साथ थी, वे किसी फैक्ट्री में बेल्डिग का काम करते थे, महीने में 10-12 हजार रुपये कमा लेते थे, जिसमें दो हजार रुपये किराए में निकल जाते थे। एक कमरे में तीन लोग रहते थे, दो निकल गए तो पूरा किराया का बोझ नहीं पर आ गया और मजबूरी में घर आना पड़ा। सुशील कहते हैं अब आगे बिहार में ही रोजगार देखूंगा, गांव में उनके हिस्से की खेती-बाड़ी भी थोड़ी-बहुत बची है। 

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